आम एवं खास की नजर में, उत्तर प्रदेश एमएलसी (स्थानीय निकाय) का चुनाव

राजनीति

रोज़ाना खबर/पहली वार्ता ब्यूरो,प्रयागराज

उत्तर प्रदेश एमएलसी चुनाव के पर्चा दाखिल होने के बाद, नाम वापसी एवं मतदान, मतगणना जैसे सभी कार्य अब मात्र औपचारिकता बस रह गई हैं। यहां यह भी बताना जरूरी है, जिस प्रकार से पिछली सरकारे द्वारा इस चुनाव को सत्ता पक्ष के अनुकूल बना दिया गया था।

उसी लिहाज से आज भी आम और खास दोनों ही लोग इसको सत्ता पक्ष का चुनाव मान रहे हैं, पिछली सरकारों ने इस चुनाव को अपने पक्ष में करने के लिए खुल्लम खुल्ला शासन-प्रशासन का दुरुपयोग किया है जिसको आम जनता ने भी अपने आंखों देखा है, जिसके आधार पर विपक्ष सरकार के ऊपर अंगुली उठा नहीं सकता, वैसे तो इस बिगड़ी व्यवस्था पर लगाम लगनी ही चाहिए और इस पर पक्ष और विपक्ष को गंभीर चिंतन भी करना चाहिए, नहीं तो जिस प्रकार से बिगड़ी व्यवस्था की परिपाटी चलती चली आ रही है उसी प्रकार से चलती रहेगी और जो विपक्ष में रहेगा केवल चिल्लाता ही रहेगा और इस विषय पर कहीं से भी सहानुभूति मिलने वाली नहीं रहेगी और वर्तमान में जिस प्रकार से एमएलसी चुनाव की लड़ाई का परिदृश्य समूचे प्रदेश में जो दिखाई पड़ रहा है और कुछ सीटों पर निर्विरोध निर्वाचन होना यह सब आम लोगों को पिछली सरकारों के इतिहास को जान लेने पर ही बहुत कुछ साफ और स्पष्ट हो जाता।

जिस प्रकार से आज समाजवादी पार्टी दिखावा कर रही है और अनुशासन की पाठ पढ़ रही है यदि इसी पाठ एवं नियम को अपने कार्यकाल में लागू किया होता तो आज उसको दिखावा करने की जरूरत न पड़ती इसके लिए शास्त्र में भी स्पष्ट रूप से विभिन्न रूपों में लिखा गया है जैसे “चाल चलो सादा निभई बाप दादा” लेकिन यह पार्टी अपनी पहचान ही गुंडों, लफंगो, मवालियों, उच्चको एवं माफिया के रूप में बना लिया है इसका जीता जागता उदाहरण एक ओर जहां प्रदेश सरकार का लखनऊ में शपथ ग्रहण हो रहा हो, वही दूसरी ओर सपा के गुंडों द्वारा गोरखपुर में नंगा नाच किया जा रहा हो और इनके मुखिया द्वारा न्याय की बात कहीं जा रही हो यह सब जनता के गले नहीं उतरता, इसीलिए जनता इनके कर्मों का फल समय-समय पर इन्हें देती रहती है।

यहां जानकारों एवं मठाधीशो की बात माने तो एमएलसी चुनाव में उनके भी राय अलग-अलग है, किसी के द्वारा इस चुनाव को पिछली सरकारों की भांति बताया जा रहा हैं तो किसी के द्वारा इसे सत्ता पक्ष का ही चुनाव माना जा रहा हैं, यहां दिलचस्प बात यह है कि यह चुनाव केवल मात्र धन, बल एवं सत्ता पक्ष का चुनाव होता है इसके आधार पर ज्यादातर रिजल्ट सत्ता पक्ष के पक्ष में आता है, जबकि यह चुनाव अस्थानीय निकाय/ जनमत के निकाय का चुनाव होता है लेकिन होता ऐसा नहीं है जो लोकतंत्र के लिए बहुत ही घातक है।

इस चुनाव को जहां भाजपा पूरी दमदारी से लड रही है तो वही सपा इस चुनाव को एक अनाथ की श्रेणी में लड़ती दिखाई दे रही है, बहरहाल प्रदेश के पूरे रिजल्ट आने के बाद ही सही निष्कर्ष सामने आएगा और आम एवं खास की नजर में यह चुनाव एक रोचक पहेली रहेगी।

 

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