भारतीय संस्कृतिक विरासत को मिली नई पहचान?

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भावना वर्मा रोजाना खबर,मेरठ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने कई ऐसी पहल शुरू की है जो संस्कृति और संस्कार के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बनी है। भारत की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दिलाने में राष्ट्रीय एकता और नागरिक कर्तव्य बोध एक कड़ी का काम करती है।

नए भारत की समृद्धि के लिए भारत गौरवभासी इतिहास के साथ वर्तमान के नए आयामों को जोड़ते हुए सुनहरे भविष्य की पटकथा लिखने में व्यस्त है। आज भारत चल पड़ा है, निकल पड़ा है… खोया हुआ सम्मान वापस दिलाने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से विरासत पर गर्व करने का संकल्प लिया था वो भी साकार हो रहा है। भारत की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दिलाने में राष्ट्रीय एकता और नागरिक कर्तव्य बोध एक कड़ी का काम करती है। ये वो मजबूत कड़ी है

जो देश को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को भारत से जोड़ती है। भारत की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण, हमारी विरासत एवं कलाकृतियों को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए प्रतिबद्ध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के निरंतर प्रयास से आज भारत अपनी खोई हुई विरासत, अपने गौरव को नई भव्यता दे रहा है।

इसका उदाहण है अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, काशी में बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर, उज्जैन में महाकाल लोक कॉरिडोर, हिमालय पर केदारनाथ धाम का पुनर्विकास, चारों धाम के लिए विश्व स्तरीय सड़कें, सिखों का पवित्र डेरा बाबा नानक-करतारपुर साहिब कॉरिडोर। ऐसी अनगिनत पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने शुरू की हैं जो भारत के सांस्कृतिक वैभव को नया रूप दे रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सिर्फ स्वदेश में ही नहीं बल्कि विदेशों से भी अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को अपनी धरती पर वापस लाने में जुटा है।

आज भारत स्वदेश दर्शन के लिए 15 पर्यटन सर्किट भी बना रहा है जिसमें रामायण सर्किट, बौद्ध सर्किट, सूफी सर्किट, तीर्थंकर सर्किट शामिल हैं क्योंकि विकसित भारत के संकल्प को साकार करने के लिए शुरू हुई पहल में संस्कृति और संस्कार एक महत्वपूर्ण कड़ी है। भारत में आने वाले विदेशी मेहमान अब सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि देश के अन्य सांस्कृतिक स्थानों पर भी जाते है। भारत यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों में अपनी जगह बना रहा है। भारत संग्रहालयों का निर्माण कर अपने गौरवशाली इतिहास का मान बढ़ा रहा है। भारत आजादी के इतिहास में देशवासियों के दिल में स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री संग्रहालय हो या नेताजी सुभाषचंद्र बोस संग्रहालय, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी हो या जलियांवाला बाग स्मारक संग्रहालय का पुनर्निर्माण, एक ऐसे नए भारत का निर्माण हो रहा है जो नई सोच और सदियों पुरानी संस्कृति को लेकर आगे बढ़ें।

भारत: एक राष्ट्र ही नहीं, संस्कृति और विचार भी

भारत के लिए धर्म का अर्थ है, हमारे कर्तव्यों का सामूहिक संकल्प। हमारे संकल्पों का ध्येय है, विश्व का कल्याण, मानव मात्र की सेवा। किसी राष्ट्र का सांस्कृतिक वैभव इतना विशाल तभी होता है, जब उसकी सफलता का परचम, विश्व पटल पर लहरा रहा होता है। सफलता के शिखर तक पहुंचने के लिए आजादी के अमृतकाल में भारत अपनी ‘विरासत पर गर्व’ करते हुए आज अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण पूरी गति से करा रहा है। काशी में विश्वनाथ धाम, सोमनाथ या फिर उत्तराखंड में केदारनाथ-बद्रीनाथ तीर्थ क्षेत्र में विकास के कार्य नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। आजादी के बाद पहली बार चारधाम प्रोजेक्ट के जरिए चारों धाम सभी मौसम के अनुकूल सड़कों से जुड़ने जा रहे हैं। आजादी के बाद पहली बार करतारपुर साहिब कॉरिडोर खुला है, हेमकुंड साहिब रोपवे से जुड़ने जा रहा है। इसी तरह, स्वदेश दर्शन और प्रसाद योजना से देशभर में राष्ट्र की आध्यात्मिक चेतना के ऐसे कितने ही केंद्रों का गौरव पुनर्स्थापित हो रहा है। भव्य ‘महाकाल लोक’ भी अतीत के गौरव के साथ भविष्य के स्वागत के लिए तैयार है।

कोणार्क का सूर्य मंदिर हो या महाराष्ट्र में एलोरा का कैलाश मंदिर, यह विश्व में सबको विस्मित करता है। कोणार्क सूर्य मंदिर की तरह ही गुजरात का मोढेरा सूर्य मंदिर भी है, जहां सूर्य की प्रथम किरणें सीधे गर्भगृह तक प्रवेश करती हैं। इसी तरह, तमिलनाडू के तंजौर में राजाराज चोल द्वारा बनवाया गया बृहदेश्वर मंदिर है। कांचीपुरम में वरदराजा पेरुमल मंदिर है, रामेश्वरम में रामनाथ स्वामी मंदिर है। बेलूर का चन्नकेशवा मंदिर है, मदुरई का मीनाक्षी मंदिर है। ऐसे कितने ही मंदिर हैं, जो ‘न भूतो न भविष्यति’ के जीवंत उदाहरण हैं। इन मंदिरों के जरिए जब पीढ़ियां इस विरासत को देखती हैं, उसके संदेशों को सुनती हैं, तो एक सभ्यता के रूप में यह भारत की निरंतरता और अमरता की कहानी कहता है। आजादी के इस अमृतकाल में अमर अवंतिका भारत के सांस्कृतिक अमरत्व की घोषणा कर रही है।

आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से पंच प्राण का आह्वान किया, जिसमें गुलामी की मानसिकता से मुक्ति उसका महत्वपूर्ण अंग है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बारे में बताया था कि आजादी के इतने वर्षों के बाद उन्हें इसका जिक्र क्यों करना पड़ा। उन्होंने कहा कि हमारे देश को गुलामी की मानसिकता ने ऐसा जकड़ा हुआ है कि प्रगति का हर कार्य कुछ लोगों को अपराध की तरह लगता है। प्रगति के काम को गुलामी के तराजू से तोला जाता है। इसलिए लंबे समय तक हमारे यहां, अपने आस्था स्थलों के विकास को लेकर एक नफरत का भाव रहा। इसकी वजह एक ही थी- अपनी संस्कृति को लेकर हीन भावना, अपने आस्था स्थलों पर अविश्वास, अपनी विरासत से विद्वेष। आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के निर्माण के समय जो हुआ वो सभी को ज्ञात है। राम मंदिर के निर्माण के समय के इतिहास भी सबके सामने है। दरअसल, गुलामी की मानसिकता ने हमारे पूजनीय पवित्र आस्था स्थलों को जर्जर स्थिति में ला दिया था। सैकड़ों वर्षों से मौसम की मार सहते आ रहे पत्थर, पूजा स्थल जाने के मार्ग, दशकों तक आध्यात्मिक केंद्रों की स्थिति ऐसी रही कि वहां की यात्रा जीवन की सबसे कठिन यात्रा बन जाती थी। विकास के नए अवसर, नई पहचान आस्था के यह केंद्र सिर्फ एक ढांचा नहीं बल्कि भारत के लिए प्राण शक्ति है, प्राण वायु की तरह हैं। वह हमारे लिए ऐसे शक्तिपुंज हैं जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हमें जीवंत बनाए रखते हैं।

इसी सोच के साथ बीते कुछ वर्षों में एक दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ पुनरोद्धार की पहल हुई है। इसी का परिणाम है कि काशी, उज्जैन, अयोध्या अनगिनत ऐसे श्रद्धा के केंद्र अपने गौरव को पुन: प्राप्त कर रहे हैं। केदारनाथ, बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब की श्रद्धा को भी संभालते हुए आधुनिकता के साथ सुविधाओं से जोड़ा जा रहा है। अयोध्या में भव्य राम मंदिर बन रहा है। गुजरात के पावागढ़ में मां कालिका के मंदिर से लेकर देवी विंध्यांचल के कॉरिडोर तक, भारत अपने सांस्कृतिक उत्थान का आह्वान कर रहा है। घनघोर उपेक्षा के शिकार आस्था के स्थानों के गौरव को पुनर्जीवित किया जा रहा है। आस्था के इन केंद्रों तक पहुंचना अब हर श्रद्धालु के लिए सुगम हो रहा है। जो व्यवस्थाएं विकसित हो रही हैं वह बड़े- बुजुर्गों के लिए तो सुविधाजनक है, नई पीढ़ी के लिए भी श्रद्धा और आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं।

आध्यात्म से जुड़े स्थलों के विकास व पुनर्निर्माण का एक पक्ष यह भी है कि स्थानीय लोगों को रोजगार-व्यवसाय का अवसर मिलता है और जीवन में सुगमता आती है। जब पहाड़ पर रेल, रोड, रोपवे कनेक्ट होते हैं तो यह पहाड़ के जीवन को सहज, सुगम और शानदार बना देते हैं। यह सुविधाएं पहाड़ों पर पर्यटन के साथ-साथ परिवहन को भी आसान करती हैं। प्रयास को विकास का जरिया बनाते भी देश देख रहा है। भारत की संस्कृति और संस्कार, सेवा, सुशासन और गरीब कल्याण के साथ विकसित भारत के सुनहरे सपने को समर्पित है।

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